श्री गणेशाय नमः।
श्री सरस्वत्यै नमः।
श्री गुरुभ्यो नमः।
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द्वादश ज्योतिर्लिंग
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प्रस्तावना
आज का विषय है – द्वादश ज्योतिर्लिंग। अर्थात बारह ज्योतिर्लिंग।
यह कोई साधारण कथा नहीं है। यह वह कथा है, जिसे सुनकर मन पवित्र हो जाता है। यह वह कथा है, जिसे सुनकर हजारों वर्ष पुरानी परम्परा आपके हृदय में उतर आती है।
तो आप सब शांत होइए। मन को एक जगह रखिए। और इस कथा को ऐसे सुनिए, जैसे आप स्वयं उन बारह दिव्य स्थानों की यात्रा कर रहे हों।
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प्रथम अध्याय
ज्योतिर्लिंग क्या हैं?
"ज्योतिर्लिंग" शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – ज्योति और लिंग।
ज्योति का अर्थ है – प्रकाश, दिव्य तेज, वह प्रकाश जो स्वयं से प्रकट होता है, जिसे सूर्य-चन्द्र की भी आवश्यकता नहीं।
और लिंग का अर्थ है – चिह्न, प्रतीक, वह रूप जिसके द्वारा निराकार ब्रह्म को पहचाना जाता है।
अतः "ज्योतिर्लिंग" का अर्थ हुआ – प्रकाश-स्तम्भ रूप शिव। वह शिव जो अनन्त ज्योति के स्तम्भ के रूप में प्रकट हुए।
अब यहाँ एक बात समझ लेनी चाहिए। साधारण शिवलिंग और ज्योतिर्लिंग में अंतर होता है।
साधारण शिवलिंग की स्थापना मनुष्यों द्वारा की जाती है। परन्तु ज्योतिर्लिंग स्वयंभू होते हैं। अर्थात वे स्वयं प्रकट होते हैं, किसी ने उन्हें स्थापित नहीं किया। वे अनादि हैं, अनन्त हैं, और स्वयं प्रकाशमान हैं।
हमारे शास्त्रों में – शिवपुराण, स्कन्दपुराण, लिंगपुराण, पद्मपुराण – इन बारह ज्योतिर्लिंगों का बड़ा विस्तार से वर्णन है। विशेष रूप से शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता में तो इनका पूरा निरूपण है।
और यह धारणा है कि – जहाँ-जहाँ महादेव ने इस अनन्त ज्योति-स्तम्भ के रूप में प्रकट होकर अपने भक्तों को दर्शन दिए, वे स्थान आगे चलकर ज्योतिर्लिंग तीर्थ बन गए।
और एक और बात – द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में इन बारहों के नाम-स्मरण को अत्यन्त पुण्यदायी बताया गया है। अर्थात मात्र नाम लेने से ही बहुत पुण्य मिलता है।
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द्वितीय अध्याय
ज्योतिर्लिंग इतने पवित्र क्यों हैं?
अब आप पूछेंगे – पंडित जी, आखिर ये ज्योतिर्लिंग इतने पवित्र क्यों हैं? इनमें ऐसा क्या विशेष है?
तो सुनिए।
पहली बात – शिवपुराण के अनुसार, ज्योतिर्लिंगों के दर्शन, पूजन और नाम-स्मरण से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, और मोक्ष की प्राप्ति होती है। जन्म-जन्मांतर के पाप – वे भी धुल जाते हैं।
दूसरी बात – यह विश्वास है कि अन्य तीर्थों में देवता 'प्रतिनिधि रूप' में विराजते हैं। परन्तु ज्योतिर्लिंगों में स्वयं महादेव साक्षात् विद्यमान हैं। आप ज्योतिर्लिंग के सामने खड़े हैं, तो समझिए – शिव स्वयं आपके सामने खड़े हैं।
तीसरी बात – प्रत्येक ज्योतिर्लिंग के पीछे एक गहरी कथा है। और ये कथाएँ केवल दन्तकथाएँ नहीं हैं। ये आध्यात्मिक सिद्धान्तों की प्रतीकात्मक व्याख्या हैं।
जैसे –
• सोमनाथ की कथा हमें अहंकार-नाश सिखाती है।
• महाकालेश्वर की कथा हमें काल पर विजय सिखाती है।
• केदारनाथ की कथा हमें प्रायश्चित्त सिखाती है।
• रामेश्वरम् की कथा हमें धर्मयुद्ध में भी विनम्रता सिखाती है।
यानी हर ज्योतिर्लिंग एक पाठशाला है। हर ज्योतिर्लिंग एक शिक्षा देता है।
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तृतीय अध्याय
ज्योतिर्लिंग कैसे प्रकट हुए?
अब यह बहुत पुरानी कथा है। बहुत पुरानी। इसे ध्यान से सुनिए।
एक बार की बात है। सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी और सृष्टि के पालनहार विष्णु जी के बीच विवाद हो गया। विवाद किस बात पर? – हममें कौन बड़ा है?
दोनों अपने-अपने को श्रेष्ठ बता रहे थे। तभी अचानक उनके सामने एक अनन्त ज्योति-स्तम्भ प्रकट हुआ। उस स्तम्भ का न आदि दिख रहा था, न अन्त।
ब्रह्मा जी ने कहा – "मैं ऊपर की ओर जाता हूँ, इस स्तम्भ का अन्त खोजने।"
और विष्णु जी ने कहा – "मैं नीचे की ओर जाता हूँ, इस स्तम्भ का आदि खोजने।"
दोनों चल पड़े। ब्रह्मा जी ऊपर गए, पर अन्त नहीं मिला। विष्णु जी नीचे गए, पर आदि नहीं मिला।
तब उस ज्योति-स्तम्भ से एक वाणी निकली –
"मैं ही शिव हूँ। मैं ही अनादि हूँ, मैं ही अनन्त हूँ। न मेरा आदि है, न अन्त। ब्रह्मा और विष्णु – दोनों मुझसे ही उत्पन्न होते हैं, और मुझमें ही लीन हो जाते हैं।"
यह था स्वयं शिव का प्रकट होना – अनन्त ज्योति-स्तम्भ के रूप में।
और इसी मूल ज्योति की बारह उपस्थापनाएँ पृथ्वी पर विशेष स्थानों पर हुईं। ये ही हैं – द्वादश ज्योतिर्लिंग।
इसके अतिरिक्त, अनेक स्थानों पर शिव ने भक्तों की रक्षा के लिए, या किसी की तपस्या से प्रसन्न होकर, ज्योति-रूप धारण किया – और वहीं ज्योतिर्लिंग बन गए।
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चतुर्थ अध्याय
बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम और स्थान
अब मैं आपको बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम और स्थान बताता हूँ। ध्यान से सुनिए, और जहाँ तक हो, मन-ही-मन इन्हें याद करते जाइए।
१. सोमनाथ – प्रभास क्षेत्र, वेरावल, गुजरात
२. मल्लिकार्जुन – श्रीशैलम्, आन्ध्रप्रदेश
३. महाकालेश्वर – उज्जैन, मध्यप्रदेश
४. ओंकारेश्वर – नर्मदा नदी के बीच द्वीप, खण्डवा, मध्यप्रदेश
५. केदारनाथ – हिमालय, रुद्रप्रयाग, उत्तराखण्ड
६. भीमाशंकर – पुणे जिला, महाराष्ट्र
७. काशी विश्वनाथ – वाराणसी, उत्तरप्रदेश
८. त्र्यंबकेश्वर – नाशिक, महाराष्ट्र
९. वैद्यनाथ – देवघर, झारखण्ड (कुछ परम्पराओं में परली वैजनाथ, महाराष्ट्र भी माना जाता है)
१०. नागेश्वर – द्वारका, गुजरात
११. रामेश्वरम् – रामेश्वरम्, तमिलनाडु
१२. घृष्णेश्वर – एलोरा, महाराष्ट्र
बारह नाम। बारह स्थान। और हर स्थान की अपनी एक अनोखी कहानी है।
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अध्याय पाँचवाँ
(अगली कड़ी की प्रस्तावना)
अब थोड़ा विराम। कथा आगे जारी रहेगी।
बस, आज के लिए इतना ही। आपने सुना –
• ज्योतिर्लिंग क्या हैं,
• वे क्यों पवित्र हैं,
• वे कैसे प्रकट हुए,
• और बारहों के नाम व स्थान।
लेकिन कथा यहीं समाप्त नहीं होती। अभी बाकी है – प्रत्येक ज्योतिर्लिंग की अपनी अलग कथा।
• सोमनाथ में चन्द्रदेव का अभिमान कैसे टूटा?
• केदारनाथ में पाण्डवों को प्रायश्चित्त क्यों करना पड़ा?
• काशी विश्वनाथ को मुक्तिदाता क्यों कहा जाता है?
वह सब अगली बार।
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समापन
तब तक के लिए –
ॐ नमः शिवाय।
जय हो महादेव की।
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सूचना
यह पुस्तक शिवपुराण, स्कन्दपुराण, लिंगपुराण एवं पद्मपुराण जैसे प्राचीन ग्रन्थों पर आधारित है। इसमें वर्णित कथाएँ एवं तथ्य धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं।
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द्वादश ज्योतिर्लिंग
